Suryaputra Karn in Mahabharat Motivational Story

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कर्ण के कर्मो का फल

Rare Death Story of Karn from Mahabharat - mytheory - Medium
आपको अगर कर्म की महत्ता देखनी है तो महाभारत काल में कर्ण के जीवन को देखिये। परम पवित्र और प्रतापी पिता सूर्य देव तथा सुशील माता कुंती की संतान ने पूरा जीवन एक सूत पुत्र हो के ही बिताया। यह उसके पिछले जन्म के कर्म ही थे जिन्होंने उसे दिया तो एक अच्छे घर में जन्म पर छीन लिया उससे वो घर। जन्म तो हुआ एक तेजस्वी माता से पर बन गया निचली जाति की माता का पुत्र। पिछले जन्मों के अच्छे कर्मो ने प्यार तो बहुत दिलवाया पर मान न दिलवाया। 
 
 
जैसा होना होता है, वैसी ही बुद्धि हो जाती है। कर्ण की माँ कुंती जब एक कुवारी कन्या थीं तो उन्होंने ऋषि दुर्वासा की इतनी सेवा की कि प्रसन्न होकर उन्होंने कुंती को एक ऐसे मंत्र का वरदान दिया जिसके जप मात्र से वो किसी भी देवता का आह्वाहन कर उनसे एक तेजस्वी बालक का वरदान प्राप्त कर सकेंगी। 
 
 
Kunti meets Karna! - Indus.heartstringsकुंती थीं तो एक बालिका ही, उन्होंने उस वरदान की शक्ति जांचने के लिए सूर्य देव का आह्वाहन किया और प्राप्त हुआ कवच कुण्डल धारी एक तेजस्वी और प्रतापी पुत्र कर्ण।  हमारे समाज से तो हम सब भली भांति परचित हैं, 
एक कुंवारी कन्या माँ बन जाये जो उसकी कितनी निंदा होगी, चाहे वो कन्या एक राजकुमारी की क्यों न हो। कुंती को इस बात का ज्ञान था, उन्होंने अपने नन्हे से बालक को माँ गंगा के हवाले कर दिया। उन्होंने उस बालक को ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया। उस नन्ही सी जान को तो मृत्यु प्राप्त हो जानी चाहिए थी पर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने  उस बालक को जीवन दान के साथ दिया माँ का प्यार। 
कर्ण था तो क्षत्रिय पर जीवन भर कहलाया सूत पुत्र। उसके पिछले जन्मों के नकारात्मक कर्मों का फल उसे अपने पूरे जीवन में उपेक्षा और अपमान से चुकाना पड़ा। अपने अच्छे कर्मो के कारण वो शूरवीर तो बना पर रहा हमेशा उपेक्षित।  
 
गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को कब और ...
जब वो अपनी शिक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास गया तो उन्होंने उसे क्षत्रिय न होने की वजह से शिक्षा नहीं दी। उन्होंने यह माना जरूर कि वो एक तेजस्वी और बुद्धिमान बालक है पर शिक्षा देने से मना कर दिया। यहाँ उसके अच्छे कर्मों ने उसे पहचान दिलवाई पर बुरे कर्मो ने उसे दिलाया तिरस्कार। 

 Suryaputra Karn in Mahabharat Motivational Story

Why Arjun Killed suryaputra karn in a unfairly war
कर्ण ने जरूर बहुत ही अच्छे कर्म किये होंगे कि वो बना परशुराम जी का शिष्य! और शिष्य भी कैसा, एक आज्ञाकारी और हमेशा सीखने के लिए तत्पर। उसके किसी पिछले एक जन्म के बुरे कर्मो का फल था या अनेक जन्मो के, यह तो कोई नहीं जानता। हम तो बस यह जानते हैं की उसका जीवन कष्टों भरा था। वो था तो परशुरम जी का प्रिय शिष्य पर बना उनके श्राप का भोगी क्योंकि वो जन्म से क्षत्रिय था, जिसका उसको खुद को पता नहीं था। एक बार परुशराम जी जब उसकी गोद में सर रख कर सो रहे थे तो लाल चींटे कर्ण के पैर पर काटने लगे, अब कर्ण क्या करता? वो एक अलग कश्मकश में फंस गया था। अगर वो उठता तो गुरु की नींद ख़राब होती, उन्हें कष्ट होता पर अगर वो बैठा रहता तो उसको कष्ट होता। उसने गुरु के कष्ट को प्राथमिकता दी, सोचा गुरु को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। इसी सोच के चलते वो बिना हिले डुले एक जगह बैठा रहा और चींटे उसका पैर का मांस खा गए। अब फिर देखिये कर्ण के कर्म और उनका फल। उसने जो किया उसके पीछे था उसका नेक इरादा पर हुआ उसका विपरीत, उसे बनाना पड़ा गुरु के श्राप का भागी। परुशराम जी जब सो के उठे तो उन्होंने देखा की बिना हिले कर्ण इतना कष्ट सहता रहा, उतनी तकलीफ तो बस एक क्षत्रिय ही सहन कर सकता है। क्योंकि वो क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे, इस बात का ज्ञान होते ही वो क्रोधित हो गए और बिना कारण जाने कर्ण को श्राप दे दिया कि जिस
पल उसे अपनी शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत होगी वो उसे भूल जाएगा।  
 
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गुरु का श्राप और वो भी गुरु परशुराम जैसे गुरु का! होना तो था सच और हुआ भी। अर्जुन से अपने अंतिम युद्ध में कर्ण को अपना सीखा हुआ मंत्र याद ही नहीं आया, जैसे की वो कभी एक अच्छा धनुर्धारी था ही नहीं। क्या गुरु का श्राप बहाना नहीं था उसके पिछले जन्मों के कर्मोँ का फल चुकाने का ! उसने तो अपनी समझ में गुरु का भला किया पर हुआ गुरु के क्रोध से सामना और बना उसकी युद्ध में हार का कारण । 
कर्ण ने न जाने किसको सताया, न जाने किसे दुःख दिया जो वो एक नहीं बल्कि दो-दो श्राप का भागी बना ।  एक जिसने उसे युद्ध में हराया, दूसरा जिसने उसके जीवन का अंत किया। हुआ यूं कि अंगराज बनने के बाद वो शिकार करने गए और उनसे गलती से एक बछड़े का शिकार हो गया जो की एक ब्राह्मण की गाय का था। फिर क्या था, ब्राह्मण देवता का गुस्सा होना तय था, और तय था उनका कर्ण को श्राप देना ।  भूल तो कर्ण से हो गयी और उसे पश्चाताप भी हुआ, माफ़ी भी मांगी पर करता क्या श्राप तो मिल ही गया था, ब्राह्मण देवता कुपित हो ही गए थे । श्राप था कि जिस प्रकार एक बछड़ा अपनी माँ से अलग हुआ उसी प्रकार अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण युद्ध में कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस जायेगा और उसकी मौत का कारण बनेगा । श्राप सच हुआ कर्ण और अर्जुन के अंतिम युद्ध में, कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया और उसे निकालते समय जब वो निहत्ता  था तब अर्जुन ने
तीर चला कर उसका वध कर दिया और हो गया कर्ण के जीवन का अंत, ख़त्म हो गयी एक दानवीर की कहानी।   
 
Indra And Krishna Cheates Karn For The Sack Of Arjun | आखिर ...
एक ऐसा दानवीर जिसने इंद्र देव को जानते और पहचानते हुए उनके ब्राह्मण रुपी भेष को सच मान लिया और अपने से अलग कर दिया कवच और कुण्डल, वो कवच और कुण्डल जिसके साथ वो पैदा हुआ था और जो उसकी खाल में चिपका था । हुआ वो लहू-लुहान पर दिया दान इंद्र देव को ।  
 
ArtStation - Karn (कर्ण), Alok Joshi
कर्म ही थे जो इतने दानवीर महापुरुष को जीवन भर अपमान, उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ा और मौत भी हुई असहाय अवस्था में। वो जानता था की दुर्योधन की हार निश्चित है पर वो ही एक इंसान था जिसने उसे अपनाया था, जिसने उसे एक प्रदेश का राजा बनाया था, तो उसने अपने पूरे जीवन में दुर्योधन का साथ दिया, उसके हर अधर्म में भागी बना और उसके लिए प्राण त्यागे । 
 
In the climactic war in the Mahabharata, the Pandava prince Arjuna ...
अपने सामने मौत खड़ी देख कर उसके मन ख्याल आया कि लोग कैसे जानेंगे की वो एक शूरवीर और महादानी था? क्योंकि उसने तो जीवन भर दुर्योधन का साथ दिया और दुर्योधन खड़ा था अधर्म की ओर ।  उसके इस प्रश्न का उत्तर स्वयं श्री कृष्ण ने दिया, वे बोले कि तुमको मारने के लिए जब सबसे बड़े धनुर्धारी को पसीने आ गए और मुझे भगवान होते हुए भी छल का सहारा लेना पड़ा तो इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा तुम्हारी वीरता का! तुम एक परम वीर योद्धा के रूप में जाने जाओगे।   
 
 
यह था कर्ण के जीवन का सार और उसके कर्मों का फल। उसके अच्छे कर्मों ने उसे तेजस्वी माता- पिता के घर में जन्म दिलाया, उसे वीर और दानवीर बनाया, और बनाया उसे दयालु पर इतने अच्छे कर्मों बावजूद वो बना अधर्म के युद्ध में भागीदार! उचित-उनुचित का ज्ञान होते हुए भी अधर्म का साथ देने पे हुआ मजबूर। हर मनुष्य को अपने कर्मो का भोगदण्ड खुद ही भोगना पड़ता है।
 
 
 
 

 
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