Why India needs to go vocal for local stores

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स्वदेशी अपनाएं

अपने प्रधानमंत्री जी ने कहा 'गो वोकल फॉर लोकल' मतलब स्वदेशी अपनाएँ। अपने देश में बना सामान खरीदें और अपने देश की इकॉनमी को मजबूत करें।इम्पोर्टेड सामान खरीदेंगे तो आप ही का पैसा बाहर जायेगा और अपनी अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा।

जब आप देश में बना हुआ सामान खरीदते हैं तो पूरी अर्थव्यवस्था का पहिया चलता है क्योंकि उस सामान को आपके घर तक पहुँचाने में बहुत से लोगों को रोज़गार मिलता है और उनके घर का चूल्हा जलता है।

जो स्वदेशी वस्तु आप खरीदते हैं उसको बनाने के लिए कच्चा माल देश का, मज़दूर देश के, दुकानदार देश का, हर चीज़ देश की।आपका ही पैसा कितनो के काम आया। अब ये देखिये की जब आप ऑनलाइन कुछ खरीदते हैं तो उसमे फायदा किसको होता है? उस व्यक्ति को जो पहले से ही अरबपति है और आपके दिए हुए पैसों की उसे कोई जरुरत नहीं। तो क्यों ना वही पैसा किसी जरूरतमंद के काम आये? जब आप कोई सामान अपने घर के पास के बाजार से खरीदते हैं तो उस दुकानदार को पैसे मिलते हैं, और उन पैसों से शायद उसके बच्चों के स्कूल की फीस भरी जाती हो या फिर घर में खाने का सामान खरीदा जाता हो। कुछ काम ही आएगा, किसी जरूरतमंद का पेट ही भरेगा।

महेश का छोटा सा परिवार था और वह लोग ख़ुशी के साथ रहते थे। पिछले कुछ दिनों से महेश का बेटा नए जूतों के लिए ज़िद कर रहा था लेकिन महेश को समय ही नहीं मिल पा रहा था की वो जूते खरीद सके। कभी वो देर से घर आता, कभी थकान, कभी ट्रैफिक जाम। एक दिन पत्नी ने पूछ ही लिया की बेटे के लिए जूते क्यों नहीं ला देते? महेश की आँखें भीग गयी जवाब देने में, वो बोला, ऑनलाइन खरीदारी के ज़माने में दूकान पर कोई आ ही नहीं रहा, कहाँ से ला दूँ जूते?

एक तैयार सामान को बनाने में एक पूरी श्रृंखला होती है जिससे जुड़े हर व्यक्ति को काम मिलता है। कच्चा माल, ढुलाई, ट्रांसपोर्टेशन, मज़दूर, वर्कर, उन व्यवसायों में अनगिनत काम करने वाले इत्यादि सबको काम मिलता है और देश का पैसा देश में ही रह जाता है। नयी नौकरियां उत्पन्न होती है, रोजगार के साधन उत्पन्न होते हैं, जितने लोगों को पैसा मिलता है वो लोग उस पैसे को वापस इसी अर्थव्यवस्था में खर्च करते हैं। अर्थव्यवस्था का पहिया घूमता है और देश को मजबूत करता है।

Why India needs to go vocal for local stores

इसके विपरीत जब आप इम्पोर्टेड सामान खरीदते हैं तो वह पहिया दूसरे देश का घूमता है। उस देश के लोगों को काम मिलता है और उनकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। आपके पैसों से किसी दूसरे देश की इकॉनमी और करेंसी मजबूत होती है।

यहाँ चीन का उदाहरण देना चाहता हूँ। सन सत्तर के दशक में जब चीन की अर्थव्यवस्था बहुत अच्छी नहीं थी तब उन्होंने एक केंद्रीय व्यवस्था बनाई देश के लिए और सत्तर से अस्सी के दशक में व्यापार पर ध्यान दिया। अपनी शिक्षा पर ध्यान दिया, विशेषज्ञ बनाये और उन्हें पूरी दुनिया में भेजा विभिन्न उत्पादों और देशों के बारे में जानने के लिए। वह विशेषज्ञ हर तरह के उत्पादों की बारीकियां जानने के बाद वापस आये और अपनी सरकार को बताया। यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है की वह विशेषज्ञ वापस लौट के आये ना की बाहर के देशों में बस गए। चीन में देशभक्ति किसी को सिखाने की जरुरत नहीं पड़ती। फिर वहां की सरकार ने एक लम्बे समय के लिए कार्य योजना बनाई जिसमे व्यापार के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, सस्ता लेबर, बिजली, रोड इत्यादि उपलब्ध कराये। उन्होंने मशीन पर जोर नहीं दिया जिससे की जनता को रोजगार भी मिल सके। अस्सी के दशक में पूरी दुनिया चीन के उत्पादों से पट गयी जो अन्य देशों के महंगे उत्पादों की लगभग नक़ल थी लेकिन उनके चौथाई दर पर उपलब्ध थी। दुनिया को चीन की ऐसी शक्ति का पता चला की वह हर तरह के उत्पाद बना सकते हैं और वो भी बहुत कम खर्च पर। आज पूरी दुनिया के लगभग सभी उत्पाद चीन में बनते हैं क्योंकि वहां हर तरह की सुविधा उपलब्ध है वो भी बहुत कम दर पर। चीन ने व्यापार की दुनिया का मूल मन्त्र जान लिया है - सामान की गुणवत्ता ठीक रखिये, लागत कम करिये और प्रति यूनिट लाभ कम रखिये जिससे आप ज्यादा सामान बेच सकें। मोबाइल के बारे में अगर देखें तो बाकी कंपनियों के चालीस हज़ार के मोबाइल में जो सुविधाएँ हैं वही सारी सुविधाएँ चीन के बारह हज़ार के मोबाइल में उपलब्ध हैं। सामान की लागत वही है बस चीन ने अपने खर्चे कम कर दिए। प्रति यूनिट लाभ कम है लेकिन जो सामान बाकी दुनिया पचास यूनिट बेचती है चीन उसी चीज़ की पचास हज़ार यूनिट बेचता है। इस पूरे घटना क्रम में चीन के नागरिकों ने अपनी सरकार और अपने देश का साथ दिया, अपने देश में बना सामान खरीदा। आप होटल में नहीं रहते की जो सुविधा मिलेगी उसका ही बिल देंगे, आप एक देश में रहते हैं, ये घर है आपका, योगदान दीजिये। जो चीज़ें ख़राब हैं, उसको बनाने में या ठीक करने में अपना सहयोग दीजिये। भारत में बना सामान खरीदिये। भारत को आत्मनिर्भर बनाइये।

 

 

जब एक्सपोर्ट से ज्यादा इम्पोर्ट होता है तो भारतीय रुपया कमजोर होता है। कभी अमेरिकी डॉलर एक भारतीय रुपये के बराबर था और आज 75 रुपये के बराबर है। आज हम अपनी मेहनत से कमाए हुए पैसों से अमेरिका और चीन जैसे देशों की इकॉनमी मजबूत कर रहे हैं और वहां के लोगों का घर चलाने में मदद कर रहे हैं। अगर आपको लगता है की आपके करने से चीज़ें नहीं बदलेंगी तो ऐसा नहीं है, आप शुरू तो करिये, लोग जुड़ते जायेंगे। हर जन आंदोलन किसी ने अकेले ही शुरू किया था। देश के प्रति हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते। देश अपना है और चलाना भी हमें खुद से है। अगर आपको लगता है की कोई और आ के देश चलाएगा तो आपको याद दिला दूँ की लोग आये थे देश चलाने, अपना देश भर के 1947 में बड़ी मुश्किल से वापस गए थे। अपनी जिम्मेदारियों को टालना या उससे भागना बहुत ही आसान काम है, लेकिन यह कायरता है। ये सोचिये की हम अपने बच्चों के लिए कैसा देश छोड़ना चाहते हैं? आत्मनिर्भर भारत या किसी और देश पर निर्भर भारत? फैसला सोच समझ के करिये। देश में बना सामान खरीदिये, खरीदना शुरू करिये, बहुत सा सुधार करने की जरुरत है तो सुधार में अपना सहयोग कीजिये।

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