Youtube vs Tiktok

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पौधा वैसा ही बनेगा जैसी खाद होगी!

कर्म  प्रधान

कोरोना जोर-शोर से हमारी पृथ्वी पर तांडव कर रहा है। कुछ लोग इस कदर इस वायरस से परेशान हैं  कि उन्होंने हर चीनी सामान को खरीदने का सोच लिया है। यहाँ तक कि चीनी एप टिक-टॉक और सोशल मीडिया प्लेटफार्म यू-ट्यूब के यूज़र्स के बीच में शीत युद्ध चल रहा है। 

यह मतभेद, वाद-विवाद तो अपने-अपने सोचने की शक्ति का प्रतिफल है। पर यहाँ गौर करने वाली बात है भाषा शक्ति का प्रयोग!

लोग अभद्र भाषा के प्रयोग से अपने आप को लोकप्रिय समझने लगे हैं क्योंकि उनका वीडियो जो पॉपुलर हो गया है, उन्हें ज्यादा सब्सक्राइबर जो मिल गए हैं।हम इंसानो को अपना मज़ाक बनते देख कर बहुत गुस्सा आता है, मन करता है कि मजाक बनाने वाले को किसी तरह चुप करा दें, उसकी बोलती बंद करा दें।जब अपने पे पड़ती है तो बुरा लगता है पर वहीँ जब दूसरों का मजाक बनाने का मौका मिलता है या किसी दूसरे का मजाक बनते हुए देखते हैं तो क्या मजा आता है! है सच!

सोचिये एक यू ट्यूबर एक टिक टोकर का मजाक बनाता है, अभद्र, बोलने और सुनने वाली भाषा का प्रयोग करता है तो उसके वीडियो को पहले से चौगुने लाइक्स मिलते हैं। उसके चैनल के सब्सक्राइबर महज कुछ दिनों में दुगुने हो जाते हैं।जरा रुकिए और सोचिये कि जब अपना मजाक, अपने लिए अपशब्द अच्छे नहीं लगते तो दूसरों के लिए उन शब्दों का प्रयोग क्यों आनंद देता है?

यह तो अपनी-अपनी निजी सोच है। पर हम सब इस बात से सहमत होंगे कि हम जो करते हैं उसका फल हमें या तो इस जनम में या तो अगले में जरूर मिलता है।

हमारा जीवन कर्म प्रधान है।

जब वो यू ट्यूबर उस टिक टोकर का मजाक बना रहा था या फिर अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा था तो वो अपने अच्छे कर्म कम कर रहा था। वो कर्म जो भविष्य में किसी मुसीबत के समय उसके काम आते।यह तो उस यू

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